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ये रचना संजीव के , जीवन को उसकी यथास्थिति में देखने का सहज प्रयास भर है फिर चाहें वो प्रकृति हो रिश्ते हों उनकी कमियां हों खूबियां हों ।
जीवन किस तरह किन किन चेहरों से अपनी ऊर्जा प्रकट करता है । कैसे वो तमाम सफलताओं और नाकामियों के बावजूद निरन्तरता रखता है और जैसे जैसे हम उसके इन रंगों को समझने लगते हैं वो हर छोटी बड़ी सजीव निर्जीव वस्तु में प्राण फूंक देता है
फिर हर एक शय को ज़बाँ मिल जाती है और वो आपके करीब बैठ कर अपने किस्से आपको सुनाए जाती है आप बस उनकी ज़बान में उनको रक़म करने का माद्दा भर रख सकते हो ।
ये याराने इतने गहरे हो जाते हैं कि आपको तन्हां देखा और वो आपके बाजू में आ बैठते हैं कभी गुदगुदाकर कभी मुस्कुराकर कभी गीली पलकों की शम्मे सजाकर ।
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