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शिक्षा का अधिकार, हमारा मौलिक अधिकार और उसे घर-घर तक ले जाने हेतु जिन माध्यमों की आवश्यकता होती है उसमें से एक हैं शिक्षक अर्थात गुरु । हालाँकि, गुरु तो वह प्रत्येक व्यक्ति है जिससे हम शिक्षा ग्रहण करते हैं पर सरकार ने जिसे अपना ठप्पा लगाकर एक नाम दिया है, "वह है मास्टर" । आप, जब चाहे जहाँ चाहे, कठिन से कठिन या सरल से सरल, प्रत्येक काम के लिए इस प्राणी को अनुकूल पाएंगे । यह निर्भर करता है आप पर कि आप कैसे और किन परिस्थितियों में इन्हें अनुकूल समझते हैं । पढाई-लिखाई के अलावे जितने भी काम हैं उनको करने में इन्होंने निपुणता हासिल कर ली है । ऐसा भी नहीं है कि वे पढाना नहीं चाहते या इन्हें पढ़ाई से नफरत है लेकिन परिस्थितियों के बोझ ने इन्हें गुरु से मास्टर बना दिया । पेट की आग, कच्चा या पका खाना नहीं समझता वह तो आगे आने वाले निवाले को ही मुँह में डालता है । बेराजगारों की फौज की थाली में आया नियोजित मास्टर की नौकरी, वह भी बिना किसी मशक्कत के, भला इस अवसर को कौन चूकना चाहता । न उम्र की सीमा न परीक्षा का बंधन, नंबर लाओ नौकरी पाओ की होड़ चली । पिता-पुत्र दोनों एक साथ मास्टर बनने के लिए कतारबद्ध थे । नौकरी तो मिल गयी पर परिणाम हुआ शिक्षक और गुरु, चारहजरिया, पाँचहजरिया और बकरचरबा मास्टर से मास्टरबा बन गए । यह पुस्तक है शिक्षा और तंत्र के उस परस्पर तालमेल का जिसने शिक्षा को उस गर्त में पहुँचा दिया है जहाँ से निकलने में शायद वर्षों लग जाए । अब आपको निर्णय करना है कि इसके लिए कौन दोषी है शिक्षक, समाज, सरकार या आप स्वयं ?
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