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जीवन बदलती ऋतुओं का दर्पण है, जहाँ प्रत्येक क्षण अपनी विशिष्ट छवि और रंगों में निखरता है l कभी बसंत की मुस्कान से खिला हुआ , तों कभी शरद की शीतल पवन के झोंको में बिखरा हुआ l कभी ग्रीष्म की तपन में झुलझता हुआ, तों कभी पतझड़ की निरवता में अधूरेपन का अनुभव करता हुआ l फिर होता है वर्षा ऋतू का आगमन -अपने निर्मल जल से हर भ्रम को उलझा कर , हर निश्चितता को अपने वेग में बहा ले जाती है l इन बदलते रंगों और ज्वार भाटों के मध्य , जीवन अपनी शाश्वत धारा में स्थिर और अटल बना रहता है l
हमारे निर्णय जीवन के दिशासूचक होते है -या तों मार्गदर्शक बनकर हमें सही दिशा दिखाते है , या फिर हमें पथभ्रष्ट कर विनाश का कारण बनते है , वही करुणा , विनम्रता , संयम और प्रेम से प्रेरित निर्णय हमें धर्म के आलोकित पथ पर अग्रसर करते है , जिससे हम अपने जीवन और जगत को प्रकाश से आलोकित करते है l
कुछ लोग मुरझाए हुए वृक्ष की भांति अपने भाग्य को असफल मान लेते है , तों कुछ बसंत की प्रतीक्षा में अपनी आशाओं को जीवित रखते है l जीवन वास्तव में एक सतत संघर्ष है -चेतना और विस्मृति , अच्छाई और बुराई के मध्य l भले ही अच्छाई निराशा की छाया में डगमगाए, परंतु अंततः विजय सदैव अच्छाई की होती है l इस संघर्ष की तपीश में , ह्रदय के स्वपनो को उद्देश्य की वेदी पर बलिदान देना ही पड़ता है l
देवेश की यात्रा , राधे से देवेश तक , प्रेम , वियोग और आत्मिक संघर्षो की ह्रदयविदारक पीड़ा से होकर गुजरती है l क्या मंजीरा की निर्दयता शेष और देवेश के माता -पिता का जीवन छीन लेगी , जो स्वार्थ और बलिदान के निरंतर संघर्ष में पिस रहे है ? क्या राधे , अपनी श्री- अपनी आत्मा के शाश्वत प्रेम -को त्यागकर देवेश के रूप में अपने भाग्य को स्वीकार करेगा ? क्या बुराई के अंधकार से संघर्ष करता देवेश अपनी मंजिल पा पायेगा ? क्या अपने जीवन के बसंत को पीछे छोड़ चुका
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